तपेदिक या टी.बी. : कारण, लक्षण और बचाव

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लक्षण व कारण

यह एक भयंकर बीमारी है । यह एक संक्रामक रोग है ।
यह अधिक धूम्रपान करने, शराब पीने तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने, गन्दी जगह, धुल, धुएं, सीलन जैसी जगह पर रहने, खराब भोजन करने व अधिक चिन्ता करने से भी होता है ।

राजयक्ष्मा आमतौर पर चार प्रकार का होता है । फेफङों का क्षय, गिलटी का क्षय, हड्डियों का क्षय व आँतों का क्षय । इसके कीटाणु शरीर के जिस स्थान पर जगह बना लेते हैं वहां तेजी से फैलकर उस स्थान को बुरी तरह खराब कर देते हैं । यदि इस बीमारी का फौरन इलाज न किया जाए तो शरीर को खोखला कर रोगी को मौत के मुंह में धकेल देती है । क्षय रोग में रोगी को बुखार, फेफङों में सांस लेने में कठिनाई, मुंह से बलगम तथा खाना कम होता जाता है । रोगी कमजोर होता चला जाता है ।

उपचार

लहसुन को साफ करके छान-पीस कर पानी में मिलाकर रख लीजिए ।
रोगी को 2 – 3 चम्मच की मात्रा में तीन बार दिन में देने से इस बीमारी में फायदा पहुंचता है ।

  • क्षय रोग होने पर 10 कलियां लहसुन की उबालकर खाएं । ऊपर से दूध को पिएं । लम्बे समय तक पीते रहने से यक्ष्मा ठीक हो जाता है।
  • फेफङे के क्षय रोग में लहसुन के प्रयोग से कफ गिरना कम होता है ।
    लहसुन रात को निकलने वाले पसीने को रोकता है, भूख बढ़ाता है और नींद सुखपूर्वक लाता है ।
  • लहसुन के रस से रूई तर करके सूंघना चाहिए ताकि श्वास के साथ मिलकर इसकी गंध फेफङों तक पहुंच जाए। इसे बहुत देर तक खूंघते रहना चाहिए । इसकी गन्थ तीव्र है जो प्रबल से प्रबल कीटाणुओं, कृमियों तथा असाध्य रोगों को मिटाती है । खाना खाने के बाद लहसुन का सेवन भी करना चाहिए ।
  • ग्रन्थि क्षय एवं हड्डी के क्षय में लहसुन खाना लाभदायक है ।
  • आंत्र क्षय में लहसुन का रस 5 बूंद 2 ग्राम पानी के साथ पिलाना चाहिए।

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